DeFi 2.0 उन पहलों का समूह है जो DeFi 1.0 की कमियों को दूर करती हैं। DeFi का लक्ष्य फाइनेंस को हर आम आदमी तक पहुँचाना है, लेकिन इसे स्केलेबिलिटी, सुरक्षा, केंद्रीकरण, लिक्विडिटी और जानकारी तक पहुँच जैसी दिक्कतों से जूझना पड़ा है। DeFi 2.0 का मकसद इन्हीं समस्याओं को हल करना और यूज़र अनुभव बेहतर बनाना है। अगर यह कामयाब रहा, तो वे जोखिम और उलझनें कम होंगी जो आज क्रिप्टो यूज़र्स को इससे दूर रखती हैं।
DeFi 2.0 के कई उपयोग तो अभी से चालू हैं। कुछ प्लेटफॉर्म पर आप अपने LP टोकन और यील्ड फार्म के LP टोकन को लोन के लिए कोलैटरल के तौर पर रख सकते हैं। इस तरीके से आप उनसे ज़्यादा वैल्यू निकाल पाते हैं और साथ ही पूल का फायदा भी मिलता रहता है।
आप ऐसे सेल्फ-रिपेइंग लोन भी ले सकते हैं जिनमें आपका कोलैटरल ही लेंडर के लिए कमाई करता है। यही कमाई कर्ज़ चुका देती है और उधार लेने वाले को कोई ब्याज नहीं देना पड़ता। हैक हुए स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट और इम्परमानेंट लॉस (IL) के खिलाफ बीमा इसके दो और उपयोग हैं।
DAO गवर्नेंस और विकेंद्रीकरण DeFi 2.0 में उभरते हुए रुझान हैं। दूसरी ओर, सरकारें और नियामक आगे चलकर यह तय कर सकते हैं कि कई प्रोजेक्ट कैसे चलेंगे। निवेश से पहले यह बात ध्यान में रखें, क्योंकि दी जा रही सेवाओं में बदलाव करना पड़ सकता है।
परिचय
2020 में DeFi (डिसेंट्रलाइज़्ड फाइनेंस) की शुरुआत को दो साल से ज़्यादा हो चुके हैं। तब से हमने UniSwap जैसे बेहद कामयाब DeFi प्रोजेक्ट देखे, जिसने ट्रेडिंग और फाइनेंस दोनों को विकेंद्रीकृत किया, और क्रिप्टो में ब्याज कमाने के नए तरीके भी सामने आए। लेकिन जैसा हमने बिटकॉइन (BTC) के साथ देखा, इतने नए उद्योग में अभी कई चीज़ें सुलझानी बाकी हैं। इसी वजह से DeFi के विकेंद्रीकृत ऐप्स (DApps) की नई पीढ़ी के लिए DeFi 2.0 नाम चल पड़ा।
दिसंबर 2021 तक DeFi 2.0 की पूरी लहर का इंतज़ार अब भी है, लेकिन इसकी शुरुआत साफ दिखने लगी है। इस लेख में जानिए किन बातों पर नज़र रखनी है और DeFi इकोसिस्टम की अनसुलझी समस्याओं को ठीक करने के लिए DeFi 2.0 क्यों ज़रूरी है।
DeFi 2.0 क्या है?
DeFi 2.0 एक ऐसा आंदोलन है जो DeFi की पहली लहर में आई दिक्कतों को सुधारने और उसे अपडेट करने की कोशिश कर रहा है। DeFi ने क्रिप्टो वॉलेट रखने वाले हर व्यक्ति तक विकेंद्रीकृत वित्तीय सेवाएँ पहुँचाकर खेल बदल दिया, फिर भी इसमें खामियाँ बाकी हैं। क्रिप्टो में यह सिलसिला पहले भी दिख चुका है, जब Ethereum (ETH) जैसे दूसरी पीढ़ी के ब्लॉकचेन ने बिटकॉइन को पीछे छोड़ दिया। DeFi 2.0 को उन नए अनुपालन नियमों का भी जवाब देना होगा जिन्हें देश लागू करना चाहते हैं, जैसे KYC और AML।
एक उदाहरण देखते हैं। लिक्विडिटी पूल (LP) DeFi में बेहद लोकप्रिय हुए हैं, क्योंकि इनसे लिक्विडिटी प्रोवाइडर टोकन जोड़ियाँ स्टेक करके फीस कमा सकते हैं। लेकिन अगर टोकन की कीमतों का अनुपात बदल जाए, तो लिक्विडिटी प्रोवाइडर को नुकसान का जोखिम रहता है (इम्परमानेंट लॉस)। मामूली शुल्क लेकर कोई DeFi 2.0 प्रोटोकॉल इसके खिलाफ बीमा दे सकता है। इस तरीके से LP में निवेश करने की प्रेरणा बढ़ती है और साथ ही यूज़र्स, हिस्सेदारों और पूरे DeFi उद्योग को फायदा होता है।
DeFi की सीमाएँ क्या हैं?
DeFi 2.0 के उपयोगों में गहराई से उतरने से पहले उन समस्याओं पर नज़र डालते हैं जिन्हें यह हल करना चाहता है। इनमें से कई वही दिक्कतें हैं जिनका सामना ब्लॉकचेन तकनीक और क्रिप्टोकरेंसी आमतौर पर करती हैं:
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स्केलेबिलिटी: ज़्यादा ट्रैफिक वाले ब्लॉकचेन पर, जहाँ गैस महँगी है, DeFi प्रोटोकॉल कभी-कभी धीमी और महँगी सेवा देते हैं। आसान से काम भी बहुत समय लें तो बेकार हो जाते हैं।
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ओरेकल और तीसरे पक्ष की जानकारी: बाहरी आँकड़ों पर निर्भर वित्तीय उत्पादों को बेहतर दर्जे के ओरेकल (तीसरे पक्ष के डेटा स्रोत) चाहिए।
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केंद्रीकरण: DeFi में ज़्यादा विकेंद्रीकरण लक्ष्य होना चाहिए। फिर भी कई प्रोजेक्ट में अब तक DAO के सिद्धांत नहीं अपनाए गए हैं।
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सुरक्षा: ज़्यादातर यूज़र DeFi से जुड़े खतरों को न तो संभालते हैं और न ही समझते हैं। वे ऐसे स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट में करोड़ों डॉलर दाँव पर लगा देते हैं जिन्हें वे पूरी तरह नहीं समझते। सिक्योरिटी ऑडिट होते तो हैं, लेकिन कोड में बदलाव होते ही उनकी अहमियत घट जाती है।
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लिक्विडिटी: बाज़ार और लिक्विडिटी पूल कई ब्लॉकचेन और प्लेटफॉर्म पर बँटे हुए हैं, जिससे लिक्विडिटी टुकड़ों में बँट जाती है। लिक्विडिटी देने से पैसा और उसकी पूरी वैल्यू भी लॉक हो जाती है। ज़्यादातर मामलों में लिक्विडिटी पूल में लगे टोकन कहीं और इस्तेमाल नहीं किए जा सकते, जिससे पूँजी का सही उपयोग नहीं हो पाता।
DeFi 2.0 क्यों मायने रखता है?
HODLers और मँजे हुए क्रिप्टो यूज़र्स के लिए भी DeFi डरावना और समझने में मुश्किल हो सकता है। फिर भी इसका इरादा प्रवेश की बाधाएँ हटाना और क्रिप्टो रखने वालों के लिए कमाई के नए रास्ते खोलना है। जिन लोगों को आम बैंक से लोन नहीं मिलता, वे शायद DeFi के ज़रिए ले सकें।
DeFi 2.0 इसलिए अहम है क्योंकि यह जोखिम घटाते हुए बैंकिंग को सबकी पहुँच में ला सकता है। यह पिछले हिस्से में बताई गई दिक्कतों को भी सुलझाना चाहता है, ताकि यूज़र अनुभव बेहतर हो। अगर हम यह कर पाएँ और साथ में बेहतर प्रोत्साहन भी दें, तो फायदा सबका होगा।
DeFi 2.0 के उपयोग
DeFi 2.0 के उपयोगों के लिए इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं। कई नेटवर्क पर ऐसे प्रोजेक्ट पहले से हैं जो नई DeFi सेवाएँ दे रहे हैं — Ethereum, Binance Smart Chain, Solana और स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट वाले दूसरे ब्लॉकचेन पर। इस हिस्से में हम सबसे प्रचलित उपयोग देखेंगे:
स्टेक किए गए पैसे की वैल्यू खोलना
अगर आपने कभी लिक्विडिटी पूल में टोकन की जोड़ी स्टेक की है, तो बदले में आपको LP टोकन मिले होंगे। DeFi 1.0 में आप उन LP टोकन को यील्ड फार्म में स्टेक करके अपनी कमाई बढ़ा सकते थे। DeFi 2.0 से पहले वैल्यू निकालने की कड़ी यहीं खत्म हो जाती थी। लिक्विडिटी देने के लिए वॉल्ट में करोड़ों डॉलर पड़े हैं, लेकिन पूँजी की कार्यक्षमता और बढ़ाने की गुंजाइश अब भी है।
DeFi 2.0 एक कदम आगे बढ़कर इन यील्ड फार्म LP टोकन को कोलैटरल की तरह इस्तेमाल करता है। यह किसी लेंडिंग प्रोटोकॉल से क्रिप्टो लोन लेने के लिए हो सकता है, या MakerDAO (DAI) जैसी प्रक्रिया से टोकन जारी करने के लिए। हर प्रोजेक्ट का तरीका अलग होता है, पर मकसद एक ही है: आपके LP टोकन की वैल्यू नए मौकों के लिए खुल जाए और साथ में APY भी बढ़े।
स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट बीमा
जब तक आप मँजे हुए डेवलपर न हों, स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट की गहरी जाँच करना मुश्किल है। यह जानकारी न हो तो आप किसी प्रोजेक्ट को अधूरा ही परख पाते हैं। DeFi प्रोजेक्ट में निवेश करते समय यह बड़ा जोखिम बन जाता है। DeFi 2.0 आपको किसी खास स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट पर DeFi बीमा लेने की सुविधा देता है।
मान लीजिए आप कोई यील्ड ऑप्टिमाइज़र इस्तेमाल कर रहे हैं और उसके स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट में आपके LP टोकन स्टेक हैं। अगर वह स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट टूट गया, तो आपकी पूरी जमा राशि जा सकती है। कुछ कीमत लेकर कोई बीमा प्रोजेक्ट यील्ड फार्म में जमा आपकी राशि की गारंटी दे सकता है। ध्यान रहे कि यह सिर्फ एक स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट पर लागू होगा। अगर लिक्विडिटी पूल का कॉन्ट्रैक्ट टूटता है, तो आमतौर पर आपको भुगतान नहीं मिलेगा। लेकिन अगर बीमा वाला यील्ड फार्म कॉन्ट्रैक्ट प्रभावित होता है, तो लगभग तय है कि आपको भरपाई मिलेगी।
इम्परमानेंट लॉस बीमा
अगर आप लिक्विडिटी पूल में निवेश करके लिक्विडिटी माइनिंग शुरू करते हैं, तो आपके लॉक किए दोनों टोकन की कीमत के अनुपात में कोई भी बदलाव आर्थिक नुकसान करा सकता है। इसे इम्परमानेंट लॉस कहते हैं, और नए DeFi 2.0 प्रोटोकॉल इस जोखिम को घटाने के नए रास्ते तलाश रहे हैं।
अगर जोड़ी ज़रूरी न हो, तो एकतरफा LP में सिर्फ एक टोकन डालने पर विचार कीजिए। तब प्रोटोकॉल जोड़ी के दूसरे हिस्से के तौर पर अपना नेटिव टोकन जोड़ देता है। इसके बाद उस जोड़ी में हुए स्वैप से मिलने वाली फीस प्रोटोकॉल को भी मिलती है और आपको भी।
समय के साथ प्रोटोकॉल इस फीस से एक बीमा फंड बनाता है, जो आपकी जमा राशि को इम्परमानेंट लॉस के असर से बचाता है। अगर नुकसान की भरपाई के लिए फीस कम पड़े, तो प्रोटोकॉल भरपाई के लिए और टोकन जारी कर सकता है। अगर टोकन ज़रूरत से ज़्यादा हों, तो उन्हें आगे के लिए बचाया जा सकता है या सप्लाई घटाने के लिए बर्न किया जा सकता है।
सेल्फ-रिपेइंग लोन
लोन लेने का मतलब आमतौर पर लिक्विडेशन का जोखिम और ब्याज दोनों होता है। DeFi 2.0 के साथ ऐसा होना ज़रूरी नहीं। मान लीजिए आप किसी क्रिप्टो लेंडर से 100 डॉलर का लोन लेते हैं। वह आपको क्रिप्टोकरेंसी में 100 डॉलर देता है, लेकिन 50 डॉलर का कोलैटरल माँगता है। जमा करने के बाद लेंडर उसी से ब्याज कमाकर आपका लोन चुकाता है। जब लेंडर आपकी क्रिप्टोकरेंसी से 100 डॉलर और उस पर एक अतिरिक्त शुल्क कमा लेता है, तो आपकी जमा राशि लौटा दी जाती है। यहाँ लिक्विडेशन का खतरा भी नहीं है। अगर कोलैटरल टोकन की कीमत गिरती है, तो लोन चुकाने में बस ज़्यादा समय लगेगा।
DeFi 2.0 पर नियंत्रण किसका है?
इतनी सारी सुविधाओं और उपयोगों के बीच यह सवाल वाजिब है कि इन पर नियंत्रण किसका है। ब्लॉकचेन तकनीक के साथ हमेशा विकेंद्रीकरण की मुहिम रही है। DeFi भी अपवाद नहीं। DeFi 1.0 के शुरुआती प्रोजेक्ट में से एक MakerDAO (DAI) ने इस मुहिम के लिए मिसाल कायम की। अब यह आम होता जा रहा है कि प्रोजेक्ट अपने समुदाय को फैसलों में हिस्सा दें।
कई प्लेटफॉर्म टोकन गवर्नेंस टोकन का काम भी करते हैं और धारकों को वोट देने का हक देते हैं। DeFi 2.0 के साथ इस क्षेत्र में और विकेंद्रीकरण की उम्मीद करना जायज़ है। लेकिन जैसे-जैसे अनुपालन और नियमन DeFi तक पहुँच रहे हैं, इनकी भूमिका और अहम होती जा रही है।
DeFi 2.0 के जोखिम क्या हैं और उनसे कैसे बचें?
DeFi 2.0 के कई खतरे वही हैं जो DeFi 1.0 में थे। यहाँ सबसे आम खतरे और उनसे बचाव के तरीके दिए गए हैं।
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जिन स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट से आप जुड़ते हैं उनमें बैकडोर या खामियाँ हो सकती हैं, या वे हैक हो सकते हैं। ऑडिट भी कभी किसी प्रोजेक्ट की सुरक्षा की गारंटी नहीं होता। उस विचार पर जितनी हो सके उतनी रिसर्च करें और याद रखें कि निवेश में जोखिम हमेशा रहता है।
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नियमन आपके निवेश पर असर डाल सकता है। दुनिया भर की सरकारें और अधिकारी DeFi इकोसिस्टम में दिलचस्पी ले रहे हैं। नियम-कायदे क्रिप्टो की सुरक्षा और स्थिरता बढ़ा सकते हैं, लेकिन नई पाबंदियाँ लागू होने पर कुछ प्रोजेक्ट को अपनी सेवाएँ बदलनी पड़ सकती हैं।
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इम्परमानेंट लॉस। IL बीमा के बावजूद लिक्विडिटी माइनिंग करने वाले हर व्यक्ति पर बड़ा जोखिम रहता है। यह जोखिम कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता।
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आपको अपने पैसे तक पहुँचने में दिक्कत आ सकती है। अगर आप किसी DeFi प्रोजेक्ट की वेबसाइट से स्टेकिंग कर रहे हैं, तो उस स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट को ब्लॉकचेन एक्सप्लोरर पर भी ढूँढ लें। वेबसाइट बंद हो गई तो आप निकासी नहीं कर पाएँगे। हालाँकि स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट से सीधे बात करने के लिए कुछ तकनीकी जानकारी चाहिए होगी।
अंतिम विचार
DeFi की दुनिया में कामयाब प्रोजेक्ट भले ही कई हों, DeFi 2.0 की पूरी क्षमता हमने अभी नहीं देखी है। ज़्यादातर यूज़र्स को यह विषय अब भी मुश्किल लगता है, और किसी को भी ऐसे वित्तीय उत्पाद इस्तेमाल नहीं करने चाहिए जिन्हें वे पूरी तरह न समझते हों। इस प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए, खासकर नए यूज़र्स के लिए, अभी काम बाकी है। APY कमाते हुए जोखिम घटाने के नए तरीकों में सफलता ज़रूर दिखी है, पर DeFi 2.0 अपने वादों पर खरा उतरता है या नहीं, यह देखने के लिए इंतज़ार करना होगा।
