यहाँ बात हो रही है स्विंग ट्रेडिंग की — एक लोकप्रिय निवेश तकनीक, जो डे ट्रेडिंग और पोजिशन ट्रेडिंग दोनों से अलग है।
जैसा कि आप शायद जानते हों, डे ट्रेडिंग शायद सबसे मशहूर ट्रेडिंग रणनीति है, जिसमें एक ही दिन के भीतर काफी बड़ी संख्या में लॉन्ग और शॉर्ट सौदे खोले और बंद किए जाते हैं। कभी यह सिर्फ पेशेवर ट्रेडरों का इलाका था, लेकिन अब इसने क्रिप्टो ट्रेडरों का ध्यान भी खींचा है, क्योंकि वे किसी प्लेटफॉर्म के जरिए क्रिप्टो ट्रेडिंग बॉट जैसे एल्गोरिदमिक टूल्स की ताकत इस्तेमाल कर सकते हैं।
पोजिशन ट्रेडिंग इसके उलट कहीं लंबी समय-सीमा को ध्यान में रखकर की जाती है। नाम से ही जाहिर है कि ट्रेडर एक पोजिशन लेता है, जिस पर रोजाना के उतार-चढ़ाव का खास असर नहीं पड़ता; वह लंबी अवधि के चार्ट, ट्रेंड और टूल्स के सहारे खरीदता है और तब तक होल्ड करता है जब तक निवेश या एसेट अपने शिखर पर न पहुँच जाए। एंट्री और एग्जिट कीमतें पहले से तय होती हैं और जोखिम घटाने के लिए स्टॉप-लॉस ऑर्डर लगाए जाते हैं।
स्विंग ट्रेडिंग आखिर है क्या?
स्विंग ट्रेडिंग ठीक डे ट्रेडिंग और पोजिशन ट्रेडिंग के बीच में बैठती है। लेकिन यह है क्या? स्विंग ट्रेडिंग एक सट्टेबाजी वाली तकनीक है, जिसमें किसी एसेट को लंबे समय तक — आमतौर पर कुछ दिनों से लेकर कई हफ्तों या कभी-कभी दो-तीन महीनों तक — होल्ड किया जाता है, ताकि छोटी से मध्यम अवधि का मुनाफा पकड़ा जा सके और कीमत की चालों, यानी "स्विंग्स" का फायदा उठाया जा सके।
यहाँ मकसद यह है कि आप किसी एसेट की चाल को पहचान या भाँप सकें, लहर पर सवार हों और सही वक्त पर बाहर निकल जाएँ, ताकि अगली लहर के लिए बेहतर स्थिति में रहें। बाजार इन्हीं नियमित कीमत बदलावों या स्विंग्स से परिभाषित होते हैं, जो लहरों की तरह चढ़ते और उतरते हैं। अगर आप भाँप लें कि बाजार ऊपर जा रहा है या नीचे, तो मुनाफा तेजी से बटोर सकते हैं और नुकसान सीमित रख सकते हैं। और इसके लिए एकदम सटीक टाइमिंग जरूरी नहीं है। छोटे-छोटे मुनाफे समय के साथ जुड़कर बड़ी रकम बन सकते हैं।
क्रिप्टो बाजार की चाल बहुत अस्थिर हो सकती है, यानी इस माहौल में स्विंग ट्रेडिंग स्वभाव से ही फायदेमंद या खतरनाक साबित हो सकती है — यह पूरी तरह बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। अच्छी बात यह है कि ट्रेडरों के पास कई ऐसे उपकरण मौजूद हैं जो जोखिम सीमित करने के साथ-साथ मुनाफे की संभावना भी बढ़ाते हैं। मिसाल के तौर पर, टेक्निकल एनालिसिस से ट्रेडिंग के मौके पहचाने जा सकते हैं, जबकि फंडामेंटल एनालिसिस से कीमत के ट्रेंड और पैटर्न परखे जा सकते हैं।
फंडामेंटल एनालिसिस बनाम टेक्निकल एनालिसिस
संक्षेप में कहें तो टेक्निकल एनालिसिस का सरोकार कीमत और वॉल्यूम से है। ट्रेडर सांख्यिकीय पैटर्न देखकर यह समझने की कोशिश करते हैं कि माँग और आपूर्ति कीमतों, वॉल्यूम और उतार-चढ़ाव को कैसे प्रभावित करती हैं। फिर पिछले प्रदर्शन पर आधारित कीमत पैटर्न और ट्रेंड का इस्तेमाल बाजार की धारणा और मनोविज्ञान जैसे कारकों से संकेत निकालने के लिए किया जाता है।
यहाँ किसी खास एसेट या सिक्योरिटी का बुनियादी मूल्य लगभग बेमानी है; असली अहमियत पैटर्न और ट्रेंड की है। कई तकनीकों और इंडिकेटर वाले टूलकिट की बदौलत ट्रेडर जटिल विश्लेषण कर सकते हैं (अगले हिस्से में हम इनमें से पाँच बेहतरीन इंडिकेटर पर बात करेंगे)। असल में कई क्रिप्टो ट्रेडर वही टेक्निकल इंडिकेटर इस्तेमाल करते हैं जो पारंपरिक वित्तीय बाजारों में दिखते हैं, जैसे रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स (RSI), मूविंग एवरेज कन्वर्जेंस डाइवर्जेंस (MACD) और बोलिंजर बैंड्स (BB)।
ठीक-ठीक संख्या पर बहस हो सकती है, पर याद रखना जरूरी है कि भविष्य की कीमत चालों का अंदाजा लगाते वक्त सिर्फ एक इंडिकेटर काफी नहीं होता। दूसरी तरफ, बहुत ज्यादा इंडिकेटर इस्तेमाल करने से तस्वीर धुंधली हो जाती है और वे बेअसर, बल्कि नुकसानदेह भी साबित हो सकते हैं।
फंडामेंटल एनालिसिस, इसके उलट, एसेट के आंतरिक मूल्य से जुड़ा नजरिया है। ट्रेडर तरह-तरह के आंतरिक और बाहरी चरों का विश्लेषण करके यह तय करने की कोशिश करते हैं कि कोई एसेट ओवरवैल्यूड है या अंडरवैल्यूड, और उससे मिली समझ का इस्तेमाल पोजिशन में घुसने या निकलने के लिए किया जाता है। हालाँकि क्रिप्टो में फंडामेंटल एनालिसिस कुछ मुश्किलें पेश करता है, क्योंकि बिटकॉइन को उस तरह नहीं आँका जा सकता जैसे आम कंपनियों को आँका जाता है।
स्विंग ट्रेडर आमतौर पर टेक्निकल एनालिसिस पर भरोसा करते हैं, क्योंकि उनके सौदे अपेक्षाकृत कम अवधि के होते हैं — इसीलिए इस लेख में हम फंडामेंटल एनालिसिस की बारीकियों में ज्यादा नहीं उलझेंगे (हालाँकि यह टेक्निकल एनालिसिस का पूरक बन सकती है)। जो लोग गहराई में जाना चाहते हैं, उनके लिए बहुत अच्छी सामग्री उपलब्ध है — मात्रात्मक और गुणात्मक फंडामेंटल एनालिसिस के फर्क से लेकर क्रिप्टोकरेंसी फंडामेंटल एनालिसिस की पूरी शुरुआती जानकारी तक।
स्विंग ट्रेडिंग के पाँच बेहतरीन इंडिकेटर देखने से पहले, आइए इस रणनीति के फायदे और नुकसान पर नजर डालें।
स्विंग ट्रेडिंग के फायदे और नुकसान
यह बताए बिना आगे बढ़ना ठीक नहीं होगा कि स्विंग ट्रेडिंग ट्रेडरों की किन तरीकों से मदद कर सकती है और इस रणनीति की संभावित कमजोरियाँ क्या हैं। आखिरकार, फायदे-नुकसान की सीधी-सादी गिनती आपके फैसले में निष्पक्षता की एक स्वस्थ खुराक जोड़ देती है और बेहतर समझ के साथ नतीजे तक पहुँचना आसान बना देती है।
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समय: डे ट्रेडिंग में वक्त लगता है, और वक्त ही पैसा है। स्विंग ट्रेडिंग में आपको घंटों स्क्रीन से चिपके रहने की जरूरत नहीं, क्योंकि पोजिशन एक दिन से ज्यादा समय तक रखी जाती है।
तनाव: आपने सुना ही होगा कि तनाव जानलेवा होता है, और डे ट्रेडिंग बेहद थकाऊ काम है। स्विंग ट्रेडिंग में आप पोजिशन खोलकर स्टॉप-लॉस ऑर्डर लगा सकते हैं और जिंदगी के दूसरे जरूरी हिस्सों पर ध्यान दे सकते हैं। अब जाकर सुकून मिलता है।
सरलता: फंडामेंटल अध्ययन और आंतरिक मूल्य निकालने में समय लगाने के बजाय, टेक्निकल एनालिसिस के इंडिकेटर आपको सिर्फ कीमत और वॉल्यूम पर ध्यान देने की छूट देते हैं।
फुर्ती: पोजिशन ट्रेडिंग के उलट, जिसमें लंबी समय-सीमा के लिए बंधना पड़ता है, स्विंग ट्रेडिंग में ट्रेडर छोटे मुनाफे या नुकसान पर खरीद-बिक्री करके किसी भी वक्त अपनी रणनीति को बेहतर बना सकते हैं।
लेकिन…
बाजार बंद होने के बाद का जोखिम: ट्रेडरों को उन बाजार जोखिमों से जूझना पड़ता है जो रात में और सप्ताहांत पर पैदा होते हैं।
झूलती चाल: व्यापक तौर पर देखें तो क्रिप्टोकरेंसी अपने स्वभाव से ही अस्थिर हैं, इसलिए ट्रेंड पर सवार होने या बाजार के अचानक पलटने से बचने के लिए उन पर लगातार नजर रखनी पड़ती है — वरना अनपेक्षित नुकसान हो सकता है।
छूटे हुए मौके: सौदे करना अच्छी बात है, लेकिन छोटी अवधि की चालों में उलझकर स्विंग ट्रेडर लंबी अवधि के मौके गँवा सकते हैं।
अब जब आप स्विंग ट्रेडिंग के कुछ फायदे और नुकसान जान चुके हैं, तो आइए उन इंडिकेटर पर नजर डालें जो इस काम के लिए सबसे उपयुक्त हैं।
स्विंग ट्रेडिंग के सबसे अच्छे इंडिकेटर
टेक्निकल इंडिकेटर दो तरह के होते हैं: लीडिंग और लैगिंग। लीडिंग इंडिकेटर बाजार की आगे की दिशा का अनुमान लगाने के लिए बनाए जाते हैं और तब ट्रेडिंग संकेत देते हैं जब कोई ट्रेंड शुरू होने वाला होता है। लैगिंग इंडिकेटर, इसके उलट, देर से जानकारी देते हैं — संकेत तब मिलता है जब कीमत में बदलाव हो चुका होता है या हो रहा होता है।
लीडिंग और लैगिंग इंडिकेटर समझने के लिए कार की मिसाल लीजिए: लीडिंग इंडिकेटर विंडस्क्रीन से आगे की ओर देखते हैं, जबकि लैगिंग इंडिकेटर पिछली खिड़की से उस रास्ते को देखते हैं जो पहले ही तय हो चुका है।
लीडिंग इंडिकेटर में स्टोकैस्टिक, विलियम्स %R, ऑन-बैलेंस वॉल्यूम (OBV) और रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स (RSI) शामिल हैं, जबकि लैगिंग इंडिकेटर में मूविंग एवरेज (MA), मूविंग एवरेज कन्वर्जेंस डाइवर्जेंस (MACD) और बोलिंजर बैंड्स (BB) आते हैं। एक चेतावनी: सिर्फ लीडिंग या सिर्फ लैगिंग इंडिकेटर पर निर्भर रहने के नतीजे लगभग तय तौर पर खराब होंगे। मकसद दोनों के बीच संतुलन बिठाना है।
आइए तीन लीडिंग और दो लैगिंग इंडिकेटर को नजदीक से देखें।
मोमेंटम इंडिकेटर
रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स (RSI)
ऑसिलेटर श्रेणी में आने वाला मोमेंटम इंडिकेटर, रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स (RSI), ट्रेडरों को यह तय करने में मदद करता है कि बाजार ओवरबॉट है या ओवरसोल्ड। जब RSI संकेत देता है तो उम्मीद रहती है कि बाजार पलटेगा, यानी ट्रेडर को पोजिशन में घुसने या निकलने का एक लीडिंग संकेत मिल जाता है। दूसरे शब्दों में, RSI मुख्य रूप से बाजार का मोमेंटम, ओवरबॉट व ओवरसोल्ड हालात, साथ ही डाइवर्जेंस और छिपे हुए डाइवर्जेंस पहचानने में काम आता है।
स्टोकैस्टिक ऑसिलेटर
स्टोकैस्टिक ऑसिलेटर, जो ट्रेडरों को एक ट्रेंड के खत्म होने और दूसरे के शुरू होने का पता लगाने में मदद करता है, मौजूदा क्लोजिंग कीमतों की तुलना पिछले ट्रेडिंग रेंज से करने का एक तरीका है। यह इस विचार पर टिका है कि बाजार का मोमेंटम वॉल्यूम या कीमत से पहले दिशा बदलता है, इसलिए इसका इस्तेमाल बाजार की चाल की दिशा भाँपने में किया जा सकता है — यही इसे मोमेंटम इंडिकेटर बनाता है। स्टोकैस्टिक एक बाउंड ऑसिलेटर है, यानी यह 0 से 100 के पैमाने पर चलता है। 80 से ऊपर का कोई भी स्तर बताता है कि बाजार ओवरबॉट है, जबकि 20 से नीचे का स्तर ओवरसोल्ड होने का संकेत है।
ऑन-बैलेंस वॉल्यूम (OBV)
नाम से ही साफ है कि ऑन-बैलेंस वॉल्यूम (OBV) इंडिकेटर वॉल्यूम में बदलाव के आधार पर कीमतों का अनुमान लगाता है। यह ट्रेडर का ध्यान वॉल्यूम के उन बदलावों की ओर खींचता है, जिनके साथ कीमत में वैसा बदलाव नहीं दिखता। OBV की बुनियादी सोच यह है कि बाजारों को चलाने वाली असली ताकत वॉल्यूम है। जब किसी चीज की कीमत में उसी अनुपात में बदलाव हुए बिना वॉल्यूम काफी बढ़ या घट जाता है, तो माना जाता है कि आखिरकार कीमत भी उसी दिशा में चढ़ेगी या गिरेगी। दूसरी ओर, OBV इंडिकेटर भ्रामक संकेत भी दे सकता है, जिसकी भरपाई लैगिंग इंडिकेटर से की जा सकती है।
ट्रेंड इंडिकेटर
मूविंग एवरेज कन्वर्जेंस डाइवर्जेंस (MACD)
मूविंग एवरेज कन्वर्जेंस डाइवर्जेंस (MACD) एक तरह का ऑसिलेटर इंडिकेटर है। यह ट्रेंड का पीछा करने वाली तकनीक है, जो मूविंग एवरेज के जरिए बिटकॉइन जैसे किसी वित्तीय एसेट का मोमेंटम आँकती है। MACD एक लैगिंग इंडिकेटर है, क्योंकि यह उन कीमत घटनाओं का पीछा करता है जो पहले ही घट चुकी हैं। मूविंग एवरेज (MA) दरअसल एक रेखा है, जो तय अवधि में पिछले आँकड़ों का औसत मूल्य दिखाती है। वित्तीय बाजारों के संदर्भ में इन्हें दो श्रेणियों में बाँटा जाता है: सिंपल मूविंग एवरेज (SMA) और एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज (EMA)। मूविंग एवरेज का आपसी रिश्ता कन्वर्जेंट या डाइवर्जेंट हो सकता है — कन्वर्जेंट रेखाएँ एक-दूसरे की ओर खिंचती हैं और डाइवर्जेंट रेखाएँ दूर हटती हैं।
वोलैटिलिटी इंडिकेटर
बोलिंजर बैंड्स (BB)
बोलिंजर बैंड एक लैगिंग इंडिकेटर है, जिसका इस्तेमाल यह तय करने के लिए होता है कि पिछले सौदों के मुकाबले मौजूदा कीमत कितनी "ऊँची" या "नीची" है। इस वजह से ये आँकने में मदद करते हैं कि बाजार अस्थिर है या नहीं, और साथ ही यह भी कि वह ओवरबॉट है या ओवरसोल्ड। BB इंडिकेटर का मकसद यह दिखाना है कि कीमतें एक औसत मूल्य के इर्द-गिर्द किस तरह फैली हुई हैं; इसमें एक ऊपरी और एक निचला बैंड होता है, साथ ही एक बीच का बैंड (यानी बीच की मूविंग एवरेज रेखा)। बाजार की कीमत चाल के जवाब में, जब उतार-चढ़ाव ज्यादा होता है तो दोनों बगल के बैंड फैल जाते हैं (बीच की रेखा से दूर हटते हुए) और जब उतार-चढ़ाव कम होता है तो सिकुड़ जाते हैं (बीच की रेखा के करीब आते हुए)। बीच की रेखा 20 दिन की सिंपल मूविंग एवरेज (SMA) के तौर पर तय की जाती है, और ऊपरी व निचले बैंड उस SMA के मुकाबले बाजार की वोलैटिलिटी के आधार पर निकाले जाते हैं, जिसे बोलिंजर बैंड्स के तरीके में स्टैंडर्ड डेविएशन कहा जाता है।
निष्कर्ष
ट्रेडिंग में बेहद काम आने वाले इन तरीकों का विश्लेषण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस करती है और उन्हें सिग्नल में बदल देती है। ये सिग्नल अब हमारे VIP ग्रुप में भेजे जाते हैं और ऑटोट्रेड के तौर पर इस्तेमाल होते हैं। ऑटोट्रेड आपका समय बचाता है। @hafizebot से मिलिए और अपनी निजी ट्रेडिंग सेटिंग तय कीजिए। फिर इसे अपने लिए ट्रेडिंग शुरू करने दीजिए।
