टेक्निकल एनालिसिस (TA), जिसे आम बोलचाल में चार्टिंग कहा जाता है, बीते हुए प्राइस और वॉल्यूम डेटा के आधार पर यह अनुमान लगाने की कोशिश करता है कि बाजार आगे कैसा व्यवहार करेगा। क्रिप्टो बाजार में डिजिटल करेंसी की ट्रेडिंग का यह एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है।
फंडामेंटल एनालिसिस (FA) किसी एसेट की कीमत से जुड़े तमाम कारकों को खंगालता है, जबकि टेक्निकल एनालिसिस सिर्फ बीते हुए प्राइस मूवमेंट पर ध्यान देता है। इसीलिए इसे कीमतों के उतार-चढ़ाव और वॉल्यूम डेटा को समझने के औजार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है, और कई ट्रेडर इसी के जरिए फायदेमंद ट्रेंड और मौके तलाशते हैं।
टेक्निकल एनालिसिस के शुरुआती रूप 17वीं सदी में एम्स्टर्डम और 18वीं सदी में जापान में दिखाई दिए, लेकिन आधुनिक टेक्निकल एनालिसिस की जड़ें अक्सर फाइनेंशियल पत्रकार और वॉल स्ट्रीट जर्नल के संस्थापक चार्ल्स डाउ के काम में खोजी जाती हैं। डाउ उन शुरुआती लोगों में थे जिन्होंने यह देखा कि अलग-अलग एसेट और पूरे बाजार अक्सर ऐसे ट्रेंड में चलते हैं जिन्हें बांटकर पढ़ा जा सकता है। उनके काम से आगे चलकर डाउ थ्योरी निकली, जिसने टेक्निकल एनालिसिस में नए विकास को रफ्तार दी।
शुरुआती दौर में टेक्निकल एनालिसिस के बुनियादी तरीके हाथ से बनाई गई टेबल और मैनुअल कैलकुलेशन पर टिके थे। तकनीक के आगे बढ़ने और आधुनिक कंप्यूटरों के आने के साथ टेक्निकल एनालिसिस लोकप्रिय हुआ और आज यह कई निवेशकों और ट्रेडरों के लिए एक जरूरी औजार बन गया है।
टेक्निकल एनालिसिस कैसे काम करता है?
जैसा ऊपर बताया, टेक्निकल एनालिसिस मूल रूप से किसी एसेट की मौजूदा और पिछली कीमतों का अध्ययन है। इसकी सबसे बड़ी मान्यता यह है कि कीमतों का उतार-चढ़ाव बेतरतीब नहीं होता और समय के साथ आम तौर पर एक पहचाने जा सकने वाले ट्रेंड की दिशा में चलता है।
दरअसल टेक्निकल एनालिसिस मांग और आपूर्ति की उन ताकतों का विश्लेषण है जो बाजार के समग्र सेंटीमेंट को दिखाती हैं। दूसरे शब्दों में, किसी एसेट की कीमत खरीदने और बेचने वाली विपरीत ताकतों को दर्शाती है, और ये ताकतें ट्रेडरों और निवेशकों की भावनाओं से गहरे जुड़ी होती हैं, खासकर डर और लालच से।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि जिस बाजार में ट्रेडिंग वॉल्यूम और लिक्विडिटी ऊंची हो और जो सामान्य हालात में चल रहा हो, वहां टेक्निकल एनालिसिस ज्यादा भरोसेमंद और असरदार माना जाता है।
कीमतों को पढ़ने और आखिरकार मौके पहचानने के लिए ट्रेडर तरह-तरह के चार्टिंग टूल इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें इंडिकेटर कहा जाता है। टेक्निकल एनालिसिस के इंडिकेटर मौजूदा ट्रेंड पहचानने में मदद करते हैं और आगे बन सकने वाले ट्रेंड के बारे में विस्तार से जानकारी देते हैं। कुछ ट्रेडर जोखिम घटाने के लिए एक साथ कई इंडिकेटर इस्तेमाल करते हैं।
आम तौर पर इस्तेमाल होने वाले TA इंडिकेटर
टेक्निकल एनालिसिस से ट्रेड करने वाले लोग चार्ट और कीमतों के पुराने व्यवहार के आधार पर बाजार का ट्रेंड पहचानने के लिए कई अलग-अलग इंडिकेटर इस्तेमाल करते हैं। इनमें सिंपल मूविंग एवरेज (SMA) सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले और सबसे जाने-पहचाने इंडिकेटरों में से एक है। नाम से ही साफ है कि SMA एक तय अवधि में एसेट की क्लोजिंग कीमतों के आधार पर निकाला जाता है। एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज (EMA) इसी का बदला हुआ रूप है, जो पुरानी क्लोजिंग कीमतों के मुकाबले हाल की क्लोजिंग कीमतों को ज्यादा वजन देता है।
एक और खूब इस्तेमाल होने वाला इंडिकेटर है रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स (RSI), जो ऑसिलेटर कहलाने वाली श्रेणी में आता है। सिंपल मूविंग एवरेज सिर्फ समय के साथ कीमत के बदलाव को दिखाते हैं, जबकि ऑसिलेटर प्राइस डेटा पर गणितीय फॉर्मूले लगाते हैं और पहले से तय दायरे के भीतर वैल्यू देते हैं, जो RSI के मामले में 0 से 100 के बीच होती है।
बोलिंजर बैंड्स (BB) ट्रेडरों के बीच बेहद लोकप्रिय एक और वोलैटिलिटी इंडिकेटर है। यह एक मूविंग एवरेज के इर्द-गिर्द चलने वाले दो बैंड से बनता है। इसका इस्तेमाल बाजार में संभावित ओवरबॉट और ओवरसोल्ड हालात पहचानने और उतार-चढ़ाव मापने के लिए होता है।
अपेक्षाकृत आसान TA टूल के अलावा कुछ इंडिकेटर ऐसे भी हैं जो डेटा बनाने के लिए दूसरे इंडिकेटरों पर टिके होते हैं। मसलन, स्टोकैस्टिक RSI सामान्य RSI पर गणितीय फॉर्मूले लगाकर निकाला जाता है। एक और चर्चित उदाहरण है मूविंग एवरेज कन्वर्जेंस डाइवर्जेंस (MACD)। इसमें दो EMA का अंतर लेकर मुख्य लाइन यानी MACD लाइन बनाई जाती है। इसी लाइन पर एक और EMA निकालकर दूसरी लाइन बनती है, जिसे सिग्नल लाइन कहते हैं। इनके साथ MACD हिस्टोग्राम भी होता है, जो इन दोनों लाइनों के अंतर से निकाला जाता है।
ट्रेडिंग सिग्नल
इंडिकेटर आम ट्रेंड पहचानने में तो काम आते ही हैं, ये संभावित एंट्री और एग्जिट पॉइंट यानी खरीद या बिक्री के सिग्नल की जानकारी भी दे सकते हैं। ये सिग्नल तब बनते हैं जब इंडिकेटर के चार्ट पर कुछ खास घटनाएं होती हैं। उदाहरण के लिए, RSI की वैल्यू 70 या उससे ऊपर हो तो यह इशारा हो सकता है कि बाजार ओवरबॉट है। उल्टी दिशा में भी यही तर्क लागू होता है: RSI 30 या उससे नीचे गिरे तो इसे आम तौर पर ओवरसोल्ड हालात का संकेत माना जाता है।
जैसा ऊपर कहा गया, टेक्निकल एनालिसिस से मिलने वाले ट्रेडिंग सिग्नल हमेशा सही नहीं होते और इंडिकेटर काफी शोर यानी झूठे सिग्नल भी पैदा करते हैं। यह बात खासकर क्रिप्टो बाजार पर लागू होती है, जो पारंपरिक बाजारों से कहीं छोटा है और इसीलिए ज्यादा अस्थिर भी।
आलोचनाएं
टेक्निकल एनालिसिस हर तरह के बाजार में आम है, फिर भी बहुत से लोग इसे विवादित और भरोसे लायक नहीं मानते और अक्सर इसे "सेल्फ-फुलफिलिंग प्रोफेसी" यानी खुद को सच कर देने वाली भविष्यवाणी कहते हैं। यह शब्द उन घटनाओं के लिए इस्तेमाल होता है जो सिर्फ इसलिए घटती हैं क्योंकि बड़ी संख्या में लोग उनकी उम्मीद कर रहे होते हैं।
आलोचकों का कहना है कि फाइनेंशियल बाजारों में जब बहुत सारे ट्रेडर और निवेशक एक ही तरह के इंडिकेटर (जैसे सपोर्ट या रेजिस्टेंस) पर भरोसा करते हैं, तो उन इंडिकेटरों के काम कर जाने की संभावना अपने आप बढ़ जाती है।
दूसरी ओर टेक्निकल एनालिसिस के कई समर्थक मानते हैं कि हर चार्ट पढ़ने वाले का चार्ट देखने और उपलब्ध ढेरों इंडिकेटर इस्तेमाल करने का अपना अलग तरीका होता है, इसलिए यह लगभग नामुमकिन है कि बहुत सारे ट्रेडर हूबहू एक ही रणनीति अपनाएं।
फंडामेंटल एनालिसिस बनाम टेक्निकल एनालिसिस
टेक्निकल एनालिसिस की बुनियादी मान्यता यह है कि बाजार की कीमत में किसी एसेट से जुड़ा सारा फंडामेंटल डेटा पहले ही शामिल हो चुका होता है। लेकिन टेक्निकल एनालिसिस जहां मुख्य रूप से पुराने प्राइस और वॉल्यूम डेटा यानी मार्केट चार्ट पर ध्यान देता है, वहीं फंडामेंटल एनालिसिस (FA) कहीं ज्यादा व्यापक शोध पर टिका होता है और गुणात्मक कारकों को ज्यादा अहमियत देता है।
फंडामेंटल एनालिसिस यह मानकर चलता है कि किसी एसेट का आगे का प्रदर्शन पुराने डेटा से बाहर के कारकों से तय होता है। असल में यह किसी कंपनी, कारोबार या एसेट की वास्तविक कीमत का अंदाजा अलग-अलग सूक्ष्म और व्यापक आर्थिक हालात के आधार पर लगाने की तकनीक है, जैसे कंपनी का नेतृत्व और साख, बाजार में मुकाबला, ग्रोथ रेट और उद्योग की स्थिति।
इसलिए हम कह सकते हैं कि फंडामेंटल एनालिसिस टेक्निकल एनालिसिस से अलग है। टेक्निकल एनालिसिस मुख्य रूप से कीमतों के बदलाव और बाजार के व्यवहार का अनुमान लगाने के औजार के तौर पर काम आता है, जबकि फंडामेंटल एनालिसिस किसी एसेट के इतिहास और उसकी संभावनाओं को देखकर तय करता है कि वह ज्यादा आंका गया है या कम। फंड मैनेजर और लंबी अवधि के निवेशक आम तौर पर फंडामेंटल एनालिसिस को तरजीह देते हैं, जबकि कम अवधि के ट्रेडर टेक्निकल एनालिसिस की ओर झुकते हैं।
टेक्निकल एनालिसिस का एक बड़ा फायदा यह है कि यह मात्रात्मक डेटा पर आधारित होता है। इससे कीमतों की चाल को निष्पक्ष तरीके से जांचने का आधार मिलता है और फंडामेंटल एनालिसिस के ज्यादा गुणात्मक तरीकों से जुड़े कुछ अनुमानों की गुंजाइश खत्म हो जाती है।
फिर भी, ठोस आंकड़ों पर टिके होने के बावजूद टेक्निकल एनालिसिस निजी पूर्वाग्रह और व्यक्तिगत नजरिए से पूरी तरह मुक्त नहीं है। मिसाल के लिए, जो ट्रेडर किसी एसेट के बारे में पहले से कोई खास नतीजा मान बैठा है, वह अपने TA टूल को इस तरह इस्तेमाल कर सकता है कि वे उसके पूर्वाग्रह की ही पुष्टि करें, और कई बार वह ऐसा अनजाने में करता है। इसके अलावा जब बाजार में कोई साफ पैटर्न या ट्रेंड न हो, तब टेक्निकल एनालिसिस गुमराह भी कर सकता है।
आखिरी बात
लंबे समय से चली आ रही आलोचनाओं और इस बहस को छोड़ दें कि कौन सा तरीका बेहतर है, तो बहुत से लोग मानते हैं कि टेक्निकल और फंडामेंटल एनालिसिस को साथ मिलाकर इस्तेमाल करना ज्यादा समझदारी है। यह ट्रेडरों और निवेशकों, दोनों के काम आता है, जैसे कि सस्ते एंट्री और एग्जिट पॉइंट तलाशते वक्त।
