डिसेंट्रलाइज़्ड फाइनेंस (DeFi) में धोखाधड़ी कैसे पहचानें?

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चेतावनी: यह लेख एक सामान्य गाइड है, जिसका मकसद DeFi उपयोगकर्ताओं और निवेशकों की सुरक्षा में मदद करना है। यह कोई संपूर्ण सूची नहीं है और इसे निवेश सलाह न समझें। आपके निवेश निर्णयों के लिए Hafizebot किसी भी तरह ज़िम्मेदार नहीं है।

परिचय

डिसेंट्रलाइज़्ड फाइनेंस (DeFi) नवाचार से भरा हुआ है। लगभग हर मिनट नए DeFi प्रोजेक्ट लॉन्च होते हैं और उनके साथ तालमेल बिठाना ही मुश्किल है, अपनी खुद की रिसर्च (DYOR) करना तो दूर की बात है।

हम अक्सर कहते हैं कि ब्लॉकचेन पर किसी अनुमति की ज़रूरत नहीं होती – यह कहने का बस दूसरा तरीका है कि ये चेन "सार्वजनिक" हैं। ब्लॉकचेन इस्तेमाल करने, उस पर डेवलपमेंट करने या उस पर चलने वाले प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए किसी की इजाज़त नहीं चाहिए। यह खूबी बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी में स्वाभाविक रूप से मौजूद है, लेकिन इसके साथ कुछ नकारात्मक पहलू भी आते हैं।

कोई भी फर्ज़ी या भ्रामक प्रोजेक्ट पोस्ट कर सकता है और उसे रोकने वाला कोई नहीं है। हालाँकि व्यावहारिक रूप से कुछ किया ज़रूर जा सकता है – एक समुदाय के तौर पर हम एक-दूसरे की मदद कर सकते हैं ताकि वे साझा संकेत पहचाने जा सकें जो असली नवाचार को दिखावटी कोशिशों से अलग करते हैं।

तो फिर किन बातों पर हमें खास ध्यान देना चाहिए?

प्रोजेक्ट का मकसद क्या है?

यह सवाल शायद बहुत सीधा लगे, खासकर अगर आप DeFi की दुनिया में नए हैं।

लेकिन ज़्यादातर क्रिप्टो एसेट कुछ भी नया पेश नहीं करते। बेशक, बेहद रोमांचक नवाचार भी मौजूद हैं – हम सब इसी वजह से तो यहाँ हैं! फिर भी कई नए प्रोजेक्ट कुछ नया करने की कोशिश किए बिना सिर्फ DeFi को लेकर बनी दिलचस्पी से कमाई करना चाहते हैं।

ऐसे में खुद से पूछिए: क्या यह प्रोजेक्ट कुछ नया लाने और सचमुच नवाचार करने की कोशिश कर रहा है? क्या ये लोग अपने प्रोजेक्ट से नई डिजिटल अर्थव्यवस्था में योगदान देना चाहते हैं? यह प्रोजेक्ट अपने प्रतिस्पर्धियों से किस तरह अलग है? क्या यहाँ कोई अनोखा अतिरिक्त मूल्य वाकई दिखाया जा रहा है?

ये बेहद सरल और सामान्य समझ वाले सवाल हैं। लेकिन सिर्फ ये सवाल पूछकर आप ज़्यादातर घोटालों को छाँट सकते हैं।

डेवलपमेंट गतिविधि

एक और पहलू जिस पर आप गौर कर सकते हैं, वह है डेवलपर गतिविधि। DeFi का ओपन सोर्स नज़रिए से गहरा नाता है।

तो अगर आपको कोडिंग की थोड़ी-बहुत समझ है, आप खुद कोड देख सकते हैं। लेकिन ओपन सोर्स की सबसे बड़ी खूबी यह है कि अगर किसी प्रोजेक्ट में पर्याप्त दिलचस्पी हो, तो कोई न कोई कोड की जाँच ज़रूर करेगा। इस तरह, अगर प्रोजेक्ट की नीयत खराब है तो वह सामने आ सकती है।

इसके अलावा आप डेवलपर गतिविधि खुद भी देख सकते हैं। क्या डेवलपर लगातार नया कोड जारी कर रहे हैं? इस मीट्रिक में हेरफेर मुमकिन है, फिर भी यह जानने के लिए यह अच्छा संकेतक है कि डेवलपर गंभीर हैं या सिर्फ कमाई करना चाहते हैं।

स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट ऑडिट

स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट और DeFi में सबसे ज़्यादा चर्चा वाले विषयों में से एक है ऑडिट। ऑडिट का मकसद यह दिखाना होता है कि कोड सुरक्षित है। हकीकत यह है कि जाँच स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट डेवलपमेंट का मुख्य हिस्सा होने के बावजूद ज़्यादातर डेवलपर अपना कोड बिना किसी जाँच के जारी कर देते हैं। इससे ऐसे कॉन्ट्रैक्ट इस्तेमाल करने का जोखिम काफी बढ़ सकता है।

यहाँ यह भी ध्यान देने लायक है कि ऑडिट महंगे होते हैं। भरोसेमंद प्रोजेक्ट आमतौर पर ऑडिट का खर्च उठा लेते हैं, जबकि धोखाधड़ी वाले प्रोजेक्ट इस झंझट में पड़ना ही नहीं चाहते।

तो क्या इसका मतलब यह है कि ऑडिट पास कर चुका प्रोजेक्ट इस्तेमाल करने के लिए पूरी तरह सुरक्षित है? नहीं। ऑडिट ज़रूरी हैं, लेकिन कोई भी ऑडिट पूरी सुरक्षा की गारंटी नहीं देता। स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट में अपना पैसा लगाने के जोखिमों को हमेशा ध्यान में रखें।

क्या संस्थापक गुमनाम हैं?

क्रिप्टो की दुनिया इंटरनेट से मिली उस आज़ादी से गहराई से जुड़ी है, जिसमें कोई अपनी पहचान निजी रख सकता है (या छद्म नाम इस्तेमाल कर सकता है)। पहली क्रिप्टोकरेंसी बनाने वाले व्यक्ति (या समूह) सातोशी नाकामोतो की असली पहचान शायद हमें कभी पता नहीं चलेगी।

लेकिन गुमनाम संस्थापकों वाली टीमें एक अतिरिक्त जोखिम पैदा करती हैं, जिस पर आपको विचार करना चाहिए। अगर ये लोग ठग निकले, तो संभावना यही है कि उन पर कोई कार्रवाई मुमकिन नहीं होगी। ऑन-चेन एनालिटिक्स टूल भले ही लगातार बेहतर हो रहे हों, असली पहचान से जुड़ी संस्थापकों की साख आज भी बहुत बड़ा फर्क डालती है।

यह भी अहम है कि गुमनाम टीमों द्वारा चलाए जा रहे सभी प्रोजेक्ट घोटाले नहीं होते। गुमनाम टीमों वाले भरोसेमंद प्रोजेक्ट के कई उदाहरण मौजूद हैं। फिर भी प्रोजेक्ट का आकलन करते समय आपको टीम की गुमनामी के नतीजों पर भी विचार करना होगा।

संक्षेप में: क्या गुमनाम संस्थापकों वाले प्रोजेक्ट बुरे होते हैं? नहीं। क्या ऐसे प्रोजेक्ट के दुर्भावनापूर्ण व्यवहार पर कार्रवाई करना ज़्यादा मुश्किल है? हाँ।

टोकन कैसे बाँटे जाते हैं?

किसी DeFi प्रोजेक्ट पर रिसर्च करते समय एक अहम मुद्दा है टोकन इकोनॉमिक्स। ठग पैसा कमाने का जो तरीका अपनाते हैं, उनमें से एक है – खुद भारी मात्रा में टोकन रखते हुए उसकी कीमत चढ़ाना और फिर अचानक अपना पूरा भंडार बेच देना।

उदाहरण के लिए, अगर सर्कुलेटिंग सप्लाई का 40-50-60% खुले बाज़ार में बेच दिया जाए तो क्या होगा? टोकन की कीमत गिर जाती है और वह अपनी लगभग पूरी वैल्यू खो देता है। कुछ लोग संस्थापकों के बड़े हिस्से को खतरे का संकेत नहीं मानते, फिर भी यह समस्या बन सकता है।

आवंटित हिस्से के अलावा आपको यह भी देखना चाहिए कि टोकन बाँटा कैसे गया। क्या वितरण किसी खास प्री-सेल के ज़रिए हुआ, जिसमें सिर्फ अंदरूनी लोगों ने शानदार कीमत पर खरीदा और फिर सोशल मीडिया पर प्रोजेक्ट की तारीफ के पुल बाँधे? क्या इनिशियल कॉइन ऑफरिंग (ICO) हुई? क्या इनिशियल एक्सचेंज ऑफरिंग (IEO) हुई, जिसमें कोई क्रिप्टो एक्सचेंज अपनी साख दाँव पर लगाता है? या फिर टोकन एयरड्रॉप से बाँटे गए, जिससे भारी बिकवाली का दबाव बनने की आशंका रहती है?

टोकन वितरण के मॉडलों में छोटे मगर अहम अंतर होते हैं। अक्सर तो यह जानकारी ही मुश्किल से मिलती है, जो अपने आप में खतरे का संकेत हो सकता है। लेकिन अगर आप प्रोजेक्ट की पूरी तस्वीर समझना चाहते हैं, तो यह जानकारी बेहद ज़रूरी है।

एग्ज़िट स्कैम की कितनी आशंका है?

यील्ड फार्मिंग (या लिक्विडिटी माइनिंग) DeFi टोकन जारी करने का एक नया तरीका है। कई नए DeFi प्रोजेक्ट यही वितरण तरीका अपनाते हैं, क्योंकि इससे प्रोजेक्ट के लिए कुछ उपयोगी वितरण आँकड़े बन सकते हैं। बुनियादी विचार यह है कि उपयोगकर्ता अपना पैसा स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट में लॉक करते हैं और बदले में नए जारी टोकन में हिस्सा पाते हैं।

आप शायद अंदाज़ा लगा चुके होंगे कि बात कहाँ जा रही है। कुछ प्रोजेक्ट लिक्विडिटी पूल में पड़ा पैसा सीधे हड़प लेते हैं। कुछ इससे ज़्यादा शातिर तरीके अपनाते हैं या बड़े पैमाने पर प्री-माइनिंग करते हैं।

इसके अलावा, नए ऑल्टकॉइन अक्सर सबसे पहले Uniswap या Sushiswap जैसे ऑटोमेटेड मार्केट मेकर (AMM) पर लिस्ट होते हैं। अगर AMM में उस ट्रेडिंग पेयर की ज़्यादातर लिक्विडिटी प्रोजेक्ट टीम ही दे रही है, तो वह उसी लिक्विडिटी को वापस खींचकर अपने टोकन बाज़ार में एक साथ बेच सकती है। इसका नतीजा आमतौर पर यह होता है कि टोकन की कीमत शून्य पर आ जाती है। बेचने के लिए कोई बाज़ार ही नहीं बचता, और इस पूरी प्रक्रिया को अक्सर रग पुल कहा जाता है।

आखिरी बात

चाहे आप यील्ड फार्मिंग के "वाइल्ड वेस्ट" में बसने का इरादा रखते हों या सिर्फ डिसेंट्रलाइज़्ड प्रोटोकॉल के ज़रिए ट्रेडिंग करते हों, DeFi घोटाले हर तरफ फैले हुए हैं। हमें उम्मीद है कि इस गाइड में दी गई सामान्य जानकारी आपको दुर्भावनापूर्ण लोगों और प्रोजेक्ट को पहचानने में मदद करेगी।