बिटकॉइन माइनिंग पूल क्या हैं?

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ब्लॉकचेन की दुनिया में बिटकॉइन माइनिंग सबसे अहम विषयों में से एक है। जो लोग हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर की मदद से क्रिप्टो करेंसी बनाते हैं और क्रिप्टो ट्रांसफ़र को दर्ज करके उनकी पुष्टि करते हैं, उन्हें माइनर कहा जाता है, और उनके इस पूरे काम को माइनिंग कहते हैं। इस दुनिया में सबसे ज़्यादा सुनाई देने वाले शब्दों में से एक है माइनिंग पूल।

माइनिंग पूल क्या है?

ASIC को माइनिंग का सबसे ज़रूरी हिस्सा माना जाता है, लेकिन असल में वे अकेले काफ़ी नहीं होते। एक अकेला माइनर जितनी बिजली खर्च करता है, उसके मुक़ाबले अपने काम से अच्छी कमाई नहीं कर पाता। इसी काम को ज़्यादा असरदार बनाने के लिए माइनिंग पूल बनाए जाते हैं। 10 माइनर्स का साथ मिलकर काम करना ही माइनिंग पूल कहलाता है। इसे और साफ़ तरीक़े से समझें तो: अगर बिटकॉइन माइनिंग एक समुद्र है, तो टीम बनकर काम करने वाले माइनर्स एक पूल हैं।

माइनिंग पूल कैसे काम करते हैं?

माइनिंग पूल बनाने वाली टीमों के मुखिया के तौर पर एक कोऑर्डिनेटर होता है, जो माइनर्स को अलग-अलग nonce वैल्यू देता है ताकि वे एक ही ब्लॉक पर काम न करें। nonce वैल्यू ऐसे रैंडम नंबर होते हैं जिन्हें माइनर एक काउंटर की तरह देखते हैं। इसी के आधार पर तय होता है कि किस माइनर को कितना इनाम मिलेगा, और इसे कोऑर्डिनेटर ही संभालता है। कोऑर्डिनेटर आम तौर पर दो तरीक़े इस्तेमाल करते हैं: PPS (pay per share) और PPLNS (pay per last N shares)।

PPS क्या है?

हर शेयर पर भुगतान, यानी PPS, पूल का सबसे पसंदीदा तरीक़ा है। इसमें पूल के हर माइनर की कार्यक्षमता तय करने के लिए उन हैश वैल्यू को देखा जाता है जिन्हें शेयर कहते हैं। हर शेयर के बदले भुगतान होता है और यह रकम समय के साथ जुड़ती जाती है।

PPLNS क्या है?

PPS के बाद सबसे ज़्यादा पसंद किया जाने वाला तरीक़ा PPLNS है। इसमें माइनर्स को इनाम तब मिलता है जब पूल के भीतर किसी ब्लॉक की माइनिंग पूरी हो जाती है। पूल में मिले ब्लॉक के आकार के हिसाब से आख़िरी N शेयर जाँचे जाते हैं और उसी से इनाम तय होता है।